व्यंजन संधि:
जब किसी व्यंजन के बाद स्वर या व्यंजन आने से जो विकार (परिवर्तन) होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं।
[1] वर्ग के पहले वर्ण (क, च, ट, त, प) का तीसरे वर्ण में परिवर्तन:
- दिक् + गज = दिग्गज
- वाक् + ईश = वागीश
- अच + अंत = अजंत
- षट् + आनन = षडानन
- अप् + ज = अब्ज
- दिक् + अंबर = दिगंबर
- वाक् + जाल = वाग्जाल
- भगवत् + गीता = भगवद्गीता
- सत् + आचार = सदाचार
- उत् + घाटन = उद्घाटन
- जगत् + ईश = जगदीश
- उत् + योग = उद्योग
- सत् + धर्म = सद्धर्म
- अप् + द = अब्द
- षट् + दर्शन = षड्दर्शन
वर्ग के पहले वर्ण का पांचवें वर्ण में परिवर्तन:
- वाक् + मय = वाङ्मय
- षट् + मास = षण्मास
- उत् + नयन = उन्नयन
- जगत् + नाथ = जगन्नाथ
- सत् + मार्ग = सन्मार्ग
- अप् + मय = अम्मय
- तत् + मय = तन्मय
- चित् + मय = चिन्मय
- जगत् + माता = जगन्माता
- वाक् + निपुण = वाङ्निपुण
‘त्’ या ‘द्’ संबंधी महत्वपूर्ण नियम:
- उत् + चारण = उच्चारण
- सत् + जन = सज्जन
- उत् + लास = उल्लास
- जगत् + जननी = जगज्जननी
- उत् + झटिका = उज्झटिका
- उत् + डयन = उड्डयन
- बृहत् + टीका = बृहट्टीका
- तत् + लीन = तल्लीन
- शरत् + चंद्र = शरच्चंद्र
- उत् + लेख = उल्लेख
‘त्’ या ‘द्’ के बाद ‘श्’ या ‘ह’ होने पर
- सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र
- उत् + श्वास = उच्छ्वास
- श्रीमत् + शरत्चंद्र = श्रीमच्छरत्चंद्र
- तत् + शिव = तच्छिव
- उत् + हार = उद्धार
- पत् + हति = पद्धति
- उत् + हृत = उद्धृत
- उत् + हत = उद्धत
- तत् + हित = तद्धित
- वाक् + हरि = वाग्घरि
‘म्’ के बाद कोई स्पर्श व्यंजन आने पर
- सम् + कल्प = संकल्प
- सम् + चय = संचय
- सम् + तोष = संतोष
- सम् + पूर्ण = संपूर्ण
- सम् + भव = संभव
- किम् + नर = किन्नर
- सम् + गम = संगम
- परम् + तु = परंतु
- सम् + देश = संदेश
- सम् + मान = सम्मान
‘म्’ के बाद ‘य, र, ल, व, श, ष, स, ह’ आने पर
- सम् + योग = संयोग
- सम् + रक्षण = संरक्षण
- सम् + लाभ = संलग्न
- सम् + सार = संसार
- सम् + हार = संहार
- सम् + वाद = संवाद
- सम् + शोधन = संशोधन
- सम् + रक्षक = संरक्षक
‘न्’ का ‘ण्’ में परिवर्तन (पूर्व में ऋ, र, ष हो तो)
- परि + मान = परिमाण
- प्र + मान = प्रमाण
- कृष् + न = कृष्ण
- भू + ण = भूषण
- राम + अयन = रामायण
- परि + नाम = परिणाम
- विष + नु = विष्णु
- शोषण = शोषण (अपवाद)
‘स्’ से पहले अ/आ को छोड़कर अन्य स्वर आने पर (षत्व संधि)
- अभि + सेक = अभिषेक
- वि + सम = विषम
- सु + सुप्त = सुषुप्त
- नि + सिद्ध = निषिद्ध
- नि + सेध = निषेध
- प्रति + स्थान = प्रतिष्ठा
- अनु + संग = अनुषंग
- सु + समा = सुषमा
- वि + साद = विषाद
‘छ’ संबंधी नियम (आधा ‘च्’ जुड़ना)
- स्व + छंद = स्वच्छंद
- आ + छादन = आच्छादन
- वृक्ष + छाया = वृक्षच्छाया
- परि + छेद = परिच्छेद
- अनु + छेद = अनुच्छेद
- वि + छेद = विच्छेद
- मातृ + छाया = मातृच्छाया
‘ऋ’, ‘र्’, ‘ष्’ के बाद ‘न्’ का ‘ण्’ होना
- परि + नाम = परिणाम
- प्र + नाम = प्रणाम
- ऋ + न = ऋण
- नर + अयन = नरायण
- भर + अन = भरण
अन्य सबसे प्रमुख और अपवादजनक उदाहरण
- उत् + आन = उद्यान
- सत् + गति = सद्गति
- सम् + कृत = संस्कृत
- परि + कार = परिष्कार
- सम् + कार = संस्कार
- भा + कर = भास्कर
- नमः + कार = नमस्कार (विसर्ग संधि के अंतर्गत शामिल, पर अत्यंत महत्वपूर्ण)
- उत् + वास = उच्छ्वास
स्वर संधि (Swar Sandhi):
के अंतर्गत दो स्वरों के मेल से विकार उत्पन्न होता है। इसके मुख्य 5 भेद होते हैं: दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण और अयादि।
1. दीर्घ स्वर संधि (जब समान स्वर मिलकर दीर्घ हो जाएं)
- धर्म + अर्थ = धर्मार्थ
- देव + आलय = देवालय
- पुस्तक + आलय = पुस्तकालय
- विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
- महा + आशय = महाशय
- परीक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी
- भोजन + आलय = भोजनालय
- विद्या + आलय = विद्यालय
- कवि + इंद्र = कविंद्र
- मुनि + ईश = मुनीश
- गिरी + ईश = गिरीश
- हरि + ईश = हरीश
- नदी + ईश = नदीश
- नदी + ईश्वर = नदीश्वर
- महि + इंद्र = मतींद्र
- भानु + उदय = भानूदय
- लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
- वधू + उत्सव = वधूत्सव
- भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व
- पितृ + ऋण = पितृण
2. गुण स्वर संधि (अ/आ के बाद इ/ई, उ/ऊ या ऋ आए तो ए, ओ, अर् बनना)
- नर + इंद्र = नरेंद्र
- सुर + इंद्र = सुरेंद्र
- ज्ञान + उपदेश = ज्ञानोपदेश
- महा + इंद्र = महेंद्र
- नर + ईश = नरेश
- गण + ईश = गणेश
- महा + ईश = महेश
- रमा + ईश = रमेश
- यथा + इष्ट = यथेष्ट
- महा + उत्सव = महोत्सव
- वीर + उचित = विरोचित
- महा + ऊर्मि = महोर्मि
- जल + ऊर्मि = जलोर्मि
- देव + ऋषि = देवर्षि
- महा + ऋषि = महर्षि
- ब्रह्म + ऋषि = ब्रह्मर्षि
- वसंत + ऋतु = वसंतर्तु
- सर्व + उदय = सर्वोदय
- सूर्य + उदय = सूर्योदय
- पर + उपकार = परोपकार
3. वृद्धि स्वर संधि (अ/आ के बाद ए/ऐ हो तो ऐ, ओ/औ हो तो औ बनना)
- एक + एक = एकैक
- सदा + एव = सदैव
- मत + एक = मतैक
- मत + एकता = मतैकता
- महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य
- लोक + एषणा = लोकैषणा
- धन + ऐश्वर्य = धनैश्वर्य
- तथा + एव = तथैव
- महा + एव = महैव
- पुत्र + एषणा = पुत्रैषणा
- जल + ओघ = जलौघ
- महा + ओज = महौज
- परम + औषध = परमौषध
- महा + औषध = महौषध
- वन + औषधि = वनौषधि
- कृष्ण + एकत्व = कृष्णैकत्व
- विद्या + अर्थ = विद्यर्थ
- सदा + आनंद = सदानंद
- गंगा + ओघ = गंगौघ
- महा + ऊर्जा = महूर्जा
4. यण स्वर संधि (इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद असमान स्वर आने पर य्, व्, र् बनना)
- यदि + अपि = यद्यपि
- अति + अधिक = अत्यधिक
- इति + आदि = इत्यादि
- अभि + आगत = अभ्यागत
- प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर
- सु + आगत = स्वागत
- अनु + अय = अन्वय
- मधु + अरि = मध्वरि
- अनु + एषण = अन्वेषण
- पितृ + आज्ञा = पित्रज्ञा
- मातृ + आज्ञा = मात्रज्ञा
- देवी + आगमन = देव्यागमन
- नदी + अर्पण = नद्यर्पण
- त्रि + अर्थ = त्र्यर्थ
- नी + ऊन = न्यून
- वि + आकरण = व्याकरण
- परि + आवरण = पर्यावरण
- उपरि + उक्त = उपर्युक्त
- अधि + आदेश = अध्यादेश
- प्रति + अर्पण = प्रत्यर्पण
5. अयादि स्वर संधि (ए, ऐ, ओ, औ का अय्, आय्, अव्, आव् में बदलना)
- ने + अन = नयन
- चे + अन = चयन
- से + अन = शयन
- गे + अन = गायन
- गै + अक = गायक
- नै + अक = नायक
- पो + अन = पवन
- भो + अन = भवन
- भो + उक = भावुक
- पो + इत्र = पवित्र
- नौ + इक = नाविक
- पौ + अक = पावक
- भौ + अक = भावक
- गो + ईश = गवीश
- गो + इंद्र = गवेन्द्र
- धौ + अक = धावक
- लो + अन = लवन
- श्रो + अन = श्रवण
- प्रो + अन = प्रवण
- गै + इका = गायिका
विसर्ग संधि (Visarga Sandhi):
1. ‘ओ’ (O) में परिवर्तन वाले उदाहरण (नियम: विसर्ग से पहले ‘अ’ और बाद में ‘अ’ या कोई सघोष व्यंजन हो)
- मनः + अनुकूल = मनोअनुकूल
- मनः + योग = मनोयोग
- वयः + वृद्ध = वयोवृद्ध
- यशः + दा = यशोदा
- पयः + द = पयोद
- मनः + रथ = मनोरथ
- तपः + बल = तपोबल
- अधः + गति = अधोगति
- पयः + धर = पयोधर
- तेजः + मय = तेजोमय
- मनः + रंजन = मनोरंजन
- पुरः + हित = पुरोहित
- सरः + ज = सरोज
- वयः + वृद्ध = वयोवृद्ध
- मनः + हर = मनोहर
2. ‘र’ (R) में परिवर्तन वाले उदाहरण (नियम: विसर्ग से पहले ‘अ’ या ‘आ’ को छोड़कर कोई स्वर हो)
- निः + आश = निराश
- निः + धन = निर्धन
- निः + बल = निर्बल
- आशीः + वाद = आशीर्वाद
- निः + गुण = निर्गुण
- दुः + जन = दुर्जन
- निः + भय = निर्भय
- दुः + बोध = दुर्बोध
- निः + मल = निर्मल
- निः + विकार = निर्विकार
- निः + धारण = निर्धारण
- बहिः + मुख = बहिर्मुख
- अंतः + गंतर्गत = अंतर्गत
- दुः + उपयोग = दुरुपयोग
- निः + आकार = निराकार
3. ‘श’ में परिवर्तन वाले उदाहरण (नियम: विसर्ग के बाद ‘च’ या ‘छ’ हो)
- निः + चल = निश्चल
- दुः + चरित्र = दुश्चरित्र
- निः + चिंत = निश्चिंत
- हरिः + चंद्र = हरिश्चंद्र
- निः + चेष्ट = निश्चेष्ट
- दुः + चक्र = दुश्चक्र
4. ‘ष’ में परिवर्तन वाले उदाहरण (नियम: विसर्ग के बाद ‘ट’ या ‘ठ’ हो)
- धनुः + टंकार = धनुष्टंकार
- निः + ठुर = निष्ठुर
- चतुः + टीका = चतुष्टीका
5. ‘स’ में परिवर्तन वाले उदाहरण (नियम: विसर्ग के बाद ‘त’ या ‘थ’ हो)
- नमः + कार = नमस्कार
- पुरः + कार = पुरस्कार
- निः + संतान = निस्संतान
- निः + तेज = निस्तेज
- दुः + साहस = দুঃसाहस
- मनः + ताप = मनस्ताप
- वाचः + पति = वाचस्पति
- नमः + ते = नमस्ते
- निः + सार = निस्सार
- चतुः + सूत्री = चतुःसूत्री
6. विसर्ग का लोप होना (नियम: विसर्ग के बाद ‘छ’ आने पर बीच में ‘च’ जुड़ जाता है)
- अनु + छेद = अनुच्छेद
- छत्र + छाया = छत्रच्छाया
- आ + छादन = आच्छादन
- वृक्ष + छाया = वृक्षच्छाया
7. विसर्ग का लोप होना और पूर्व स्वर का दीर्घ होना (नियम: विसर्ग के बाद ‘र’ होने पर)
- निः + रोग = निरोग
- निः + रस = नीरस
- निः + रव = नीरव
8. विसर्ग का लोप होना (नियम: विसर्ग के बाद ‘अ’ या ‘आ’ को छोड़कर कोई स्वर हो)
- अतः + एव = अतएव
9. विसर्ग में कोई परिवर्तन न होना (नियम: विसर्ग के बाद ‘क’, ‘ख’, ‘प’, ‘फ’ हो)
- प्रातः + काल = प्रातःकाल
- अंतः + करण = अंतःकरण
- मनः + कामना = मनकामना
- पयः + पान = पयःपान
- निः + काम = निष्काम
- निः + फल = निष्फल
- निः + कपट = निष्कपट
10. कुछ अन्य सबसे महत्वपूर्ण मिश्रित उदाहरण
- दुः + तर = दुस्तर
- दुः + साहस = দুঃसाहस
- निः + शल्क = निःशुल्क
- दुः + ख = दुःख
- निः + संदेह = निस्संदेह
- निः + स्वार्थ = निस्वार्थ
- निः + शेष = निश्शेष
- चतुः + कोण = चतुष्कोण
- बहिः + कार = बहिष्कार
- अंतः + राष्ट्रीय = अंतरराष्ट्रीय
- निः + चय = निश्चय
- दुः + प्राप्य = दुष्प्राप्य
- निः + पक्ष = निष्पक्ष
- दुः + शासन = দুঃशासन
- निः + प्राण = निष्प्राण
- चतुः + पथ = चतुष्पथ
- मनः + अनुकूल = मनोनुकूल
- दुः + कर्म = दुष्कर्म
- निः + क्रिय = निष्क्रिय
- निः + शुल्क = निःशुल्क
- निः + संकोच = निस्संकोच
- निः + तेज = निस्तेज
- दुः + साध्य = दुस्साध्य
- नमः + कार = नमस्कार
- पुरः + कार = पुरस्कार
- निः + स्पृह = निस्पृह
- अंतः + करण = अंतःकरण
- प्रातः + काल = प्रातःकाल
- अधः + पतन = अधःपतन
- वाक् + ईश = वागीश (व्यंजन संधि)
- सम् + मान = सम्मान (व्यंजन संधि)
- दिक् + गज = दिग्गज (व्यंजन संधि)
- उत् + लास = उल्लास (व्यंजन संधि)
- जगत् + नाथ = जगन्नाथ (व्यंजन संधि)
- षट् + आनन = षडानन (व्यंजन संधि)
- तत् + लीन = तल्लीन (व्यंजन संधि)